नंगी होती पहाड़िया खतरे की निशानी


वन्य जीवों और पेड़-पौधों पर संकट, खनन नीति में पर्यावरण संरक्षण को मिले प्राथमिकता

    दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर पिछले कुछ वर्षाें में बेहद ही चिन्ता का माहौल है । पर्यावरण के सन्तुलन एवं प्रदूषण से मुक्ति को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर चिन्तन-मंथन हो रहा है । विभिन्न शोध रिपोर्टाें में गिरते पर्यावरण के स्तर ने सबको नए सिरे से पर्यावरण संरक्षण के बारे में सोचने को मजबूर किया है । परन्तु धरातल पर कारगर उपायों के अभावों में लगातार पर्यावरण को नुकसान हो रहा है । ऐसे में एक कारक अंधाधुंध खनन पर्यावरण के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। विकास के नाम पर हो रहे बेहिसाब खनन से पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ वन्य जीवों एवं पेड़-पौधों पर संकट के बादल मंडरा रहे है । अंधाधुंध खनन के चलते पहाड़ों की बलि दी जा रही है । कई वन्य जीवों की प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। अत्यधिक खनन से पहाड़ी क्षेत्रों के पेड़-पौधों के विनाश से भूमि कटाव, वन्य-जीवों के रहवास, धूल और नमक से भूमि के उपजाऊपन में परिवर्तन, जल का खारा होना, समीपस्थ क्षेत्रों और वन्य क्षेत्रों में शोर जैसी समस्याएं पर्यावरण के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। और प्रकृति की सुन्दरता बढ़ाने वाली पहाड़िया स्वयं दिनोंदिन नंगी होती जा रही है । जो आने वाले कल के लिए संकट की निशानी है ।

  राजस्थान जैसे विशाल क्षेत्रफल वाले राज्य में खनन की गतिविधियां विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद पहाड़ियों में अंधाधुंध तरीके से चल रही है । जिसमें वैध खनन के साथ-साथ अवैध खनन भी बदस्तुर जारी है । इन खूबसूरत पहाड़ियों को बदसूरत कर रहे खनन से पर्यावरण पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है । खनन से पहाड़ी क्षेत्रों में वन क्षेत्र में भारी कमी आई है । पहाड़ों पर वनों की कमी व उच्च स्तर के शोर ने वन्य-जीवों के जीवन पर संकट पैदा कर दिया है । अंधाधुंध खनन से जैव विविधता पर खतरा बढ़ता जा रहा है ।

  खनन और पर्यावरण को लेकर अनेक कानून भी बनाएं गए है । जिसमें खनिज संरक्षण और विकास नियम, 1988 के अन्तर्गत पहाड़ी क्षेत्रों में खनन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी तादाद में पेड़-पौधों के रोपण व वन्य जीव-जन्तुओं के पुनर्स्थापन करने की कड़ी हिदायत दे रखी है परन्तु जिनका धरातल पर कड़ाई से पालन नही होने के चलते खनन से पेड़-पौधों व वन्य जीवों को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है ।

  अंधाधुंध खनन से पर्यावरण पर संकट बढ़ रहा है। यह मानव के अपने ही हित में है कि वह इस प्रकार की विनाशक गतिविधियों को तुरंत बंद करे अथवा कड़े कानूनों के साथ बड़े स्तर पर नियंत्रित करें । खनन के कारण पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। पहाड़ों की सुंदरता खत्म जा रही है । इस संदर्भ में उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी तमाम आदेशों की पालना सुनिश्चित होनी चाहिए । खनन से पर्यावरण पर होने वाले दुष्परिणामों को देखते हुए सरकार व प्रशासन को चाहिए कि वे इस क्षेत्र में संख्ती से कार्यवाही करे तथा खनन नीति में पेड-पौधों व जीव-जंतुओं को बचाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता प्रदान करे ।

मुकेश बोहरा अमन
साहित्यकार व पर्यावरण कार्यकर्ता



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